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Friday, September 2, 2016

नोकरानी बन क्रर चुदी

नोकरानी बन क्रर चुदी

मैं अभी २८ की हूँ। मेरे पति का स्वर्गवास हुए १ साल हो गया था। वो एक दुर्घटना में चल बसे थे। मैं एम ए पास हूँ। एक प्राईवेट स्कूल में टीचर थी लेकिन वेतन बहुत ही कम था।
उन्हीं दिनो मेरे एक सहयोगी ने बताया कि सेठ विनय के यहाँ एक घर की देखभाल के लिये एक महिला की जरूरत है। मैं उनसे जा कर मिल लूं, वो अच्छी तनख्वाह देंगे। बस उन्हें यह मत बताना कि ज्यादा पढ़ी लिखी हो।

मैं सेठ विनय के यहां ७.३० बजे ही पहुंच गई। वो उस समय घर पर ही थे। मैंने घंटी बजाई तो उन्होने मुझे अन्दर बुला लिया। मैंने उन्हें बताया कि उनके यहाँ नौकरी के लिए आई हूं।

उन्होने मुझे मुझे गौर से देखा और कुछ प्रश्न पूछे ... फिर बोले,"कितना वेतन लोगी?"

"जी ... जहां मैं काम करती थी वहां मुझे २५०० रुपये मिलते थे !"

"अभी ३००० दूंगा ... फिर काम देख कर बढ़ा दूंगा ... तुम्हें खाना और रहना फ़्री है ... जाओ पीछे सर्वेन्ट क्वार्टर है।" उन्होने चाबी देते हुए कहा "सफ़ाई कर लेना ... आज से ही काम पर आ जाओ !"

मेरी तो जैसे किस्मत ही जाग गई। किराये के मकान का खर्चा बच गया और खाना मुफ़्त ! फिर ३००० रुपये तनख्वाह। मैं तुरन्त चाबी ले कर पीछे गई, ताला खोला तो शानदार दो कमरे का मकान, सभी सुविधायें मौजूद थी। मैंने जल्दी से सफ़ाई की और घर आकर जो थोड़ा सा सामान था, दिन को शिफ़्ट कर लिया। मेरा ५ साल का एक लड़का और मैं ... और इतना बड़ा घर !

सेठ जी काम पर जा चुके थे। पर घर में ताला था। शाम को जब सेठ जी आये तो मैं उनके पास गई। उन्होंने सारा काम बता दिया। विनय सेठ कोई ३५ साल के थे। और मधुर स्वभाव के थे।

मैंने झटपट शाम का खाना बनाया ... मेरा खाना क्वार्टर में ही अलग बनता था। उसने हिदायत दी कि मुझे हमेशा नहा धो कर साफ़ रहना है ... साफ़ कपड़े ... बाल बंधे हुए ... एक दम साफ़ सुथरे ...... वगैरह। उन्होंने पहले से तैयार नये कपड़े मुझे दे दिये।

विनय बहुत मोटे इन्सान थे। कहते हैं कि उनकी बीवी उनके मोटापे के कारण छोड़ कर भाग गई थी। विनय का एक दोस्त जो उससे अमीर था और दिखता भी हीरो की तरह था ... उसकी रखैल बन कर अलग मकान में रहती थी। विनय सेट एकदम अकेले थे।

विनय सेठ को अब मैं विनय कह पर ही सम्बोधित करूंगी। विनय को जिम जाते हुए २ महीने हो चुके थे। उनका मोटापा अब काफ़ी कम हो चुका था। शरीर गठ गया था। मैं भी अब अब उनकी ओर आकर्षित होने लगी थी। औरत मर्द की जरूरत है, ये मैं जानती थी। मेरा ज्यादातर समय खाली रहने में ही गुजरता था। खाली दिमाग शैतान का घर होता है।

मैं भी भरपूर जवान थी। मेरे स्तन भी पुष्ट थे और पूरा उभार लिये हुए थे। मेरा जिस्म भी अब कसमसाता था। रह रह कर मेरे उरोज़ कसक जाते थे। रह रह कर अंगड़ाइयां आने लगती थी, कपड़े तंग से लगते थे। मेरे आगे और पीछे के निचले भाग भी अब शान्त होने के लिये कुछ मांगने लगे थे।

एक बार रात को लगभग १० बजे मुझे ख्याल आया कि मुख्य गेट खुला ही रह गया है। सोने से पहले मैं जब बाहर निकली तो मैंने देखा कि विनय की खिड़की थोड़ी सी खुली रह गई थी। मैंने यूं ही अन्दर झांका तो मेरे बदन में जैसे चींटियां रेंगने लगी।

विनय बिलकुल नंगा खड़ा था और कुछ देख कर मुठ मार रहा था। मैं वहीं खड़ी रह गई। मेरा दिल धक धक करने लगा था। शायद वो कोई ब्ल्यू फ़िल्म देख रहा था और मुठ मार रहा था। मेरा हाथ बरबस ही चूत पर चला गया और दबाने लगी। मेरी चूत गीली होने लगी ... जहाँ मैं चूत दबा रही थी वहाँ पेटीकोट गीला हो गया था।

उसके मुँह से वासना भरी गालियाँ निकल रही थी। चोद साली को और चोद ... मां चोद दे इसकी ... हाय। ... भोसड़ी के क्या लण्ड है ... ऐसा ही मुँह से अस्पष्ट शब्द बोले जा रहा था। फिर उसके मुँह से आह निकल गई और उसके लण्ड से लम्बी पिचकारी निकल पड़ी। वीर्य लण्ड से झटके खा खा कर निकल रहा था।

मेरा दिल डोलने लगा। मेरी छाती धड़कने लगी। पसीने की बून्दें छलक आई। मैं वहां से हट कर मुख्य द्वार को बन्द कर आई।

उस रात मुझे नीन्द नहीं आई। बस करवट बदलती रही। चुदने के विचार आते रहे। विनय का लण्ड चूत में घुसता नजर आने लगा था। जाने कब आंख लग गई। सुबह उठी तो मन में कसक बाकी थी।

खड़ी हो कर मैंने अंगड़ाई ली और अपने बोबे को देखा और धीरे से उसे मसलने लगी, मुझे मेरी चोली तंग लगने लगी थी और फिर ब्लाऊज के बटन बन्द करने लगी। सामने जाली वाली खिड़की से विनय मुझे ये सब करते हुए देख रहा था। मेरा दिल धक से रह गया। मैंने यूँ दर्शाया कि जैसे मैंने विनय को देखा ही नहीं। पर मुझे पता चल गया कि विनय मेरे अंगों का रस लेता है।

मैं भी अब छिप छिप के खिड़की से उसकी सेक्सी हरकतें देखने लगी। और फिर घर में आ कर खूब तड़पने लगती थी। कपड़े उतार फ़ेंकती थी, जिस्म को दबा डालती थी। विनय अब भी खिड़की पर छुप छुप कर मुझे देखता था। सिर्फ़ उसे बहकाने के लिये अब मैं भी दरवाजे पर कभी अपने बोबे दबाती और कभी चूत दबाती थी ताकि वो भी मेरी तरह तड़पे और वासना में आकर मुझे चोद दे।

पर वो मेरे सामने नोर्मल रहता था। मेरी चोली अब छोटी पड़ने लग गई थी। उरोज मसलते मसलते फ़ूलने और बड़े होने लग गये थे। एक बार तो जब वो खिड़की से देख रहा था मैंने एक मोमबत्ती ले कर उसके सामने अपनी चूत पर रगड़ ली थी।

इसी तरह छ: माह बीत गये। इसी बीच विनय ने मेरी तनख्वाह ५००० रुपये कर दी थी। ये सब मेरी सेक्सी अदाओं का इनाम था।

मुझे भी अब चुदने की इच्छा तेज़ होने लगी थी। इन दिनों विनय के जाने के बाद मैं अक्सर उनके बेडरूम में जाकर टीवी देखती थी। आज मैंने कुछ सीडी टीवी के पास देखी। मैंने यूं ही उसे उठा ली और देखने लगी। एक सीडी मुझे लगा कि ये शायद ब्ल्यू फ़िल्म है। मैंने उनमें से एक सीडी प्लेयर में लगाई और देखने लगी।

उसे देखते ही मैं तो एकदम उछल पड़ी। मेरा अनुमान सही निकला, वो ब्ल्यू फ़िल्म ही थी। मैं जिंदगी में पहली बार ब्ल्यू फ़िल्म देख रही थी। मेरे दिल की एक बड़ी हसरत पूरी हो गई ... बहुत इच्छा थी देखने की।

सीन आते गये मैं पसीने में तर हो गई। मेरे कपड़े फिर से तंग लगने लगे, लगता था सारे कपड़े उतार फ़ेंको। मेरा हाथ अपने आप चूत पर चला गया और अपना दाना मसलने लगी। कभी कभी अंगुली अन्दर डाल कर चूत घिस लेती थी ... । मेरी सांसें और धडकन तेज हो चली थी।

अचानक मैंने समय देखा तो विनय का लंच पर आने का समय हो गया था। मैंने टीवी बन्द कर दिया। अपने आप को संयत किया और अपने कपड़े ठीक कर लिये और डायनिंग टेबल ठीक करने लगी।

मेरी नजरें अब बदल गई थी। मर्द के नाम पर बस विनय ही था जिसे मैं रोज देखती थी। मैंने उसे नंगा भी देखा ... मुठ मारते भी देखा ... पेंसिल को खुद की गांड में घुसाते हुए भी देखा ... । मेरे दिल पर ये सब देख कर मेरे दिल पर छुरियाँ चल जाती थी।

मैं अपने कमरे में जाकर कपड़े बदल आई और हल्की सी ड्रेस पहन ली, जिससे मेरे उरोज और जिस्म सेक्सी लगे। मैं वापस आ कर विनय का इन्तज़ार करने लगी। विनय ठीक समय पर आ गया।

आते ही उसने मुझे देखा और देखते ही रह गया। वो डायनिंग टेबल पर बैठ गया। मैं झुक झुक कर अपने बोबे हिला कर खाना परोसने लगी। वो मेरे ब्लाऊज में बराबर झांक रहा था। मेरे बदन में कंपकंपी छूटने लगी थी। अब मैं उसे जवान और सेक्सी नजर आने लगी थी।

मैंने उसके पीछे जा कर अपने बोबे भी उससे टकरा भी दिये, फिर मैं भी सिहर उठी थी। उसने अपना खाना समाप्त किया और अपने कमरे में चला गया। मैं उसे झांक कर देखती रही। अचानक उसकी नजर सीडी पर पड़ी और वो पलक झपकते ही समझ गया।

विनय अपने बिस्तर पर लेट गया और आंखें बन्द कर ली। विनय के मन में खलबली मची हुई थी। मुझे लगा कि विनय काफ़ी कुछ तो समझ ही गया है।

मैं उसके बेडरूम में आ गई। कही से तो शुरु तो करना ही था,"सर मोजे उतार दूँ?"

"ह ... हां ... उतार दो ... और सुनो क्या तुम मेरी कमर दबा सकती हो ... ?" उसने मुझे पटाने की एक कोशिश की। मेरा दिल उछल पड़ा। मुझे इसी का तो इन्तज़ार था।

मैंने शरमा कर कहा,"जी ... दबा दूंगी ... !"

मुझे कोशिश करके आज ही उसे जाल में फांस लेना था और अपनी चूत की प्यास बुझा लेनी थी। आखिर मैं कब तक तड़पती, जब कि विनय भी उसी आग में तड़प रहा था। विनय ने अपनी कमीज उतार दी।

इतने में बाहर होर्न की आवाज आई। मुझे गुस्सा आने लगा। मेरा बेटा सचिन स्कूल से आ गया था। कही गड़बड़ ना हो जाये, या मूड बदल ना जाये।

"सर ... मैं अभी आई ... !" कह कर मैं जल्दी से बाहर आई और सचिन को कहा कि वो खाना खा ले और फिर आराम कर ले। मैं सेठ जी को लन्च करा कर आती हूँ। उसे सब समझा कर वापस आ गई।

विनय ने अपना ढीला सा पजामा पहन लिया था और उल्टा लेटा हुआ था। मैंने तेल की शीशी उठाई और बिस्तर पर बैठ गई। मैंने तेल उसकी कमर में लगाया और उसे दबाने लगी। उसे मजा आने लगा। मैं उसे उत्तेजित करने के लिये उसकी चूतड़ों की जो थोड़ी सी दरार नजर आ रही थी उस पर भी तेल लगा कर बार बार छू रही थी।

"रानी ... तेरे हाथों में जादू है ... जरा नीचे भी लगा दे ... " मैं समझ गई कि वो रंग में आने लगा है। गर्म लोहे पर चोट करनी जरूरी थी, वरना मौका हाथ से निकल जाता।

मैंने कमर से थोड़ा नीचे दरार के पास ज्यादा मलना शुरू कर दिया, और अपना हाथ उसके चूतड़ के उभारों को भी लगा देती थी। मुझे लगा कि उसका लण्ड अब बिस्तर से दब कर जोर मार रहा है। उसके जिस्म की सिहरन मुझे महसूस हो रही थी। मौका पा कर इस स्थिति का मैंने फ़ायदा उठाया।

मैंने कहा,"सर अब सीधे हो जाओ ... आगे भी लगा देती हूं ... !" जैसे ही वो पलटा, उसका तन्नाया हुआ लण्ड सामने खड़ा हुआ आ गया।

मैं सिहर उठी,"हाय राम ... ! ये क्या ... !" मैंने अपना चेहरा छिपा लिया।

विनय ने कहा,"सॉरी रानी ... ! मेरे जिस्म पर सात-आठ महीने बाद किसी औरत का हाथ लगा था ... इसलिये भावनायें जाग उठी !" उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"सर जीऽऽऽ ... शरम आती है ... मैंने भी किसी मर्द को बहुत समय से छुआ ही नहीं है ... !" मैंने आंखों पर से हाथ हटा लिया ... और जैसे हामी भरते हुये विनय का साथ दिया।

"फ़िल्म कैसी लगी थी ... मजा आया ... ?"

"ज् ... जी ... क्या कह रहे है आप ... ?" मैं सब समझ चुकी थी ... मैं जानबूझ कर शरमा गई। बस विनय की पहल का इन्तज़ार था, सो उसने पहल कर दी। मेरी चूत फ़ड़क उठी थी। मैंने अपना हाथ नहीं छुड़ाया ... वह मेरा हाथ खींच कर अपने और समीप ले आया।

मेरा बदन थरथरा उठा। चेहरे पर पसीना आ गया। मेरी आंखें उसकी आंखों से मिल गई ... मैं होश खोने लगी ... अचानक मेरी चूंचियो पर उसके हाथ का दबाव महसूस हुआ ... वो दब चुकी थी ... मैं सिमट गई,"सर प्लीज ...! नहीं ... मैं मर जाऊंगी ...! "

विनय ने तकिये के नीचे से एक पांच सौ का एक पत्ता मेरी चोली में घुसा दिया। पांच सौ रुपये मेरे लिये बड़ी रकम थी ... मैं पिघल उठी। मेरा कांपता जिस्म उसने भींच लिया। मैंने अपने आप को उसके हवाले कर दिया।

"पसीना पोंछ लो !" उसने चादर के एक कोने से मेरा चेहरा पोंछ दिया और मेरे नरम कांपते होंठ को उसने अपने होंठों से दबा लिये। मेरी इच्छा पूरी हो रही थी। पैसे भी मिल रहे रहे थे और अब मैं चुदने वाली थी। मेरा शरीर वासना की आग में सुलग उठा। चूत पानी छोड़ने लगी, शरीर कसमसाने लगा। उसके बलिष्ठ बाहें मुझे घेरने लगी। मेरा हाथ नीचे फ़िसलता हुआ उसके लण्ड तक पहुंच गया।

मैंने इज़ाज़त मांगी ... "सर ... छोटे साहब को ... ?"

"रानी ... मेरी रानी ... जरा जोर से थामना ... कहीं छूट ना जाये ...!" उसने अपने लण्ड को और ऊपर उभार लिया। मेरा हाथ उसके लण्ड कर कस गया। उसने मुझे एक ही झटके में बिस्तर पर खींच कर पटक दिया। और सीधे मेरी चूत पर वार किया। मेरी चूत को हाथ अन्दर डाल कर दबा दी। मैं तड़प उठी। वो चूत मसलता ही गया। मैं छटपटाती ही रही। पर उसका हाथ अलग नहीं हटाया।

"हाऽऽऽय ... रे ... सर जी ... मर गई ... क्या कर रहे हो ... आऽऽह ... माई रे ... " मेरी खुशी भरी तड़पन उसे अच्छी लगने लगने लगी।

"कहां थी तू अब तक रे ... क्या मस्त हो रही है ... " विनय नशे में बोला। मेरी चूत दबा कर कर मसलता रहा ... पर ये ५०० रुपये का नशा भी साथ था ... उसकी इच्छा मुझे पूरी जो करनी थी। मेरे सारे कपड़े एक एक कर उतरते जा रहे थे। हर बार मैं जानकर नाकाम विरोध करती ...!

अन्तत: मैं वस्त्रहीन हो गई। मेरी चूंचियाँ बाहर छलक पड़ी ... मेरा नंगा जिस्म चमक उठा। मैंने नशे में अपनी आंखे खोली तो विनय का बलिष्ठ शरीर नजर आया ... जिसे मैं छुप छुप कर कितनी बार देख चुकी थी। उसका चेहरा मुझे अपनी चूत की तरफ़ झुकता नजर आया। मेरी क्लीन शेव चूत की पंखुड़ियों के बीच रिसता पानी उसे मदहोश करने लगा।

उसकी जीभ का स्पर्श मुझे कंपकपाने लगा।

मैंने सिसकारी भरते हुए कहा,"सर ... नहीं प्लीज ... मत करिये ... " पर उसने मेरी टांगों को चीर कर चूत और खोल दी और उसके होंठ मेरी चूत से चिपक गये ... मैंने अपनी चूत मस्ती में और उभार दी।

"रानी ... ना ना करते पूरी चुद जाओगी ... " कह कर उसने चूत पर जीभ गहरी घुसा कर निकाल ली ... मैं उत्तेजना से कसमसा उठी। अब मेरा दाना और चूत दोनों ही जीभ से चाट रहा था। बहुत साल बाद मुझे फिर से एक बार ये सुख मिल रहा था।

उसने मुझे घुमा कर उल्टी कर दिया और चूतड़ों को थपथपाने लगा। यानि अब मेरी गांड की बारी थी ... ! मेरा दिल खुशी के मारे उछल पड़ा। गाण्ड चुदवाना मेरा पहला शौक रहा है उसके बाद फिर चूत की चुदाई का आनन्द ... !"

"सर नहीं ये नहीं ... प्लीज ... मेरी फ़ट जायेगी !" मैंने अपने नखरे दिखाए ... पर ये क्या ... विनय ने एक ५०० का नोट और लहरा दिया ...

"ये इस प्यारी गाण्ड चुदाई के मेरी रानी ... !" मैं और पिघल उठी ... मेरे मन चाहे काम के अब मुझे १००० रुपये मिल चुके थे, इससे ज्यादा और खुशी क्या हो सकती थी। विनय ने थूक का एक बड़ा लौंदा मेरे चूतड़ो को चीर के छेद पर टपका दिया। और उछल कर मेरी पीठ पर चढ़ गया ... कुछ ही देर में उसका लण्ड मेरी गांड के छेद में घुस चुका था। दर्द झेलना तो मेरी आदत बन चुकी थी।

"आह रे ... घुस गया सर ... !"

" रानी तू कितनी अच्छी है ... पहले कहां थी रे ... !"

"आप ही ने मुझ गरीबन पर ध्यान नहीं दिया ... हाय गाण्ड चुद गई रे ... !"

" रानी ... मैं तुझे रानी ही बना कर रखूंगा ... तूने तो मुझे खुश कर दिया है आज ... !"

धचक धचक लण्ड घुसता रहा ... मेरी गाण्ड चुदती रही ... आज मेरी गाण्ड को लण्ड का प्यारा प्यारा मजा मिल गया था। मैं विनय की अहसानमन्द हो चुकी थी। मैंने भी अब थोडी सी मन की करने की सोची ... और कहा,"सर ... आप कहे तो मैं अब आपको चोद दूँ ...?"

"कैसे ... आदमी कैसे चुद सकता है ... ?"

"आप बिस्तर पर सीधे लेट जाईए ... मैं आपके खड़े लण्ड पर बैठ कर आपको चोदूँगी ... " विनय हंस पड़ा।

"छुरी तरबूज पर पड़े या तरबूज छुरी पर ... चुदेगी तो चूत ही ना ... " मैं शरमा गई।

"हटो जी ... आ जाओ ना ... !"विनय नीचे लेट गया ... उसका खड़ा लण्ड मेरी चूत को चुनौती दे रहा था। मैं धीरे से उसके लण्ड पर निशाना लगा कर बैठ गई। पर विनय को कहाँ चैन था। उसने नीचे से ही अपने चूतड़ उछाल कर मेरी चूत को लपेटे में ले लिया और चूत को चीरता हुआ लण्ड अन्दर घुस पड़ा।

मेरा बेलेन्स गड़बड़ा गया और धच्च में लण्ड पर पूरी बैठ गई। मेरे मुख से चीख निकल पड़ी। लण्ड चूत की पूरी गहराई पर जाकर गड़ चुका था। मेरी चूत से थोडा सा खून निकल पड़ा। मैंने अंगुली से देखा तो लाल रंग ... पर ये तो लड़कियों के साथ चुदाई में साधारण सी बात होती है। पर विनय घबरा उठा,"अरे ... ये क्या ... खून ... सॉरी ... !"

मैंने उसके होंठो पर अंगुलि रख दी ... "चुप रहो न ... करते रहो ... !"

पर इसका मुझे तुरन्त मुआवजा मिल गया ... एक ५०० रुपये का नोट और लहरा उठा। ये विनय क्या कर रहा है? १५०० रुपये मेरे लिये बहुत बड़ी रकम थी।

"नहीं चाहिये मुझे ..." पर उसने मुझे दिये हुए नोटो के पास उसे रख दिया। हमारा कार्यक्रम आगे बढ़ चला ... अब मुझे पूरी जी जान से उसे सन्तुष्ट करना ही था। मैंने अपनी चूत अन्दर ही अन्दर सिकोड़ ली और टाईट कर ली ... फिर उसके लण्ड को रगड़ना शुरू कर दिया। टाईट चूत करने से मेरी चूत को चोट भी लग रही थी ... पर विनय को तंग चूत का मजा आने लगा था।

पर नतीजा ... मैं चरमसीमा पर पहुंच गई ... साथ ही विनय भी अपना शरीर लहराने लगा।

"मेरी जानु ...मेरी जान ... मैं तो गया ... निकला जा रहा है अब ... रानीऽऽऽ हाय ... ऊईईईऽऽऽऽ " विनय के साथ साथ मेरा भी रस निकलने लगा ... उसका लण्ड भी मेरी चूत में अपना वीर्य छोड़ने लगा। हम दोनो आपस में लिपट पड़े। मैं तो पूरी झड़ चुकी थी ... उसका वीर्य को मेरी चूत में लिपट कर निकालने का मौका दे रही थी ... कुछ ही देर में हम दोनो निढाल पड़े थे।

विनय उठा और पास में पड़ा तौलिया लपेट कर बाथरूम में चला गया। मुझे भी कुछ नहीं सूझा तो मैं भी उसी के साथ बाथरूम में घुस गई और पानी से अपनी चूत और लगा हुआ वीर्य साफ़ करने लगी।

"आज तो रानी ... तुमने मेरी आत्मा को प्रसन्न कर दिया ... अब एक काम करो ... सामने ब्यूटी पार्लर में जाओ और उससे कहना कि मैंने भेजा है ... "

मैं सर झुकाये बाहर आकर कपड़े पहनने लगी। और नोट गिन कर अपने ब्लाऊज में सम्हाल कर रखने लगी। पर ये क्या ... विनय ने झटके मेरे हाथों से सारे नोट ले लिये ...

"क्या करोगी इनका ... ये तो कागज के टुकड़े हैं ... " मेर दिल धक से रह गया ... मेरे होश उड़ गये, रुपये छिनने से मुझे ग्लानि होने लगी।

पर दूसरे ही क्षण मेरे चेहरे पर दुगनी खुशी झलक उठी। विनय ने अलमारी खोल कर गहने मेरी ओर उछाल दिये,"सजो मेरी रानी ... आज से तुम मेरी नौकरानी नहीं ... घरवाली की तरह रहोगी ... और रहे रुपये ! तो ये सब तुम्हारे है ...!

राखी की नये घर मैं चुदाई

राखी की नये घर मैं चुदाई



मैं शहर में कमरा तलाश कर रहा था। तभी राखी का एक दिन फोन आया कि  giga g जी का तबादला उसी शहर में हो गया है जहां मैं पढ़ता हूँ राखी ने बताया कि उन्हें सरकारी मकान मिला है रहने के लिए जो बहुत बड़ा है। राखी के कोई बच्चा तो था नहीं अभी तक सिर्फ राखी और giga ही थेआभा बोली कि मुझे कमरा ढूंढने की कोई जरुरत नहीं है। मैं उनके पास रह सकता हूँ। पिता जी भी इसके लिए राजी हो गए क्योंकि इस से मेरे खाने पीने की समस्या का भी हल मिल गया था और राखी की निगरानी में मेरे बिगड़ने का  बस दो दिन के बाद  giga g सामान लेकर शहर पहुँच गए। मकान पर giga  g के ऑफिस के लोग आये थे  giga g से मिलने और सामान उतरवाने। करीब आधे घंटे में सब लोग सामान उतरवा कर और चाय पी कर चले गए। अब सामान जमाने का काम शुरू करना था। यह काम तो राखी को ही करना था। मैं भी   राखी की मदद करने लगा। मैंने और राखी ने मिल कर बड़ा-बड़ा सामान करीने से लगा दिया। अब कुछ छोटा मोटा सामान बचा था जो हर रोज़ काम आने वाला भी नहीं था। राखी बोली कि इसे ऊपर टांड पर रख देते हैं।
तभी राखी ने आवाज दी। जाकर देखा तो  giga जी बोतल खोल कर बैठे थे और शायद एक दो पैग लगा भी चुके थे। वो कुछ खाने को मांग रहे थे।  giga ने मुझे भी लेने को कहा पर मैंने मना कर दिया क्योंकि मैंने पहले कभी नहीं पी थी।
राखी ने  giga को काजू और नमकीन निकाल कर दी और हम फिर से काम पर लग गए। काम के दौरान हम दोनों ने एक दूसरे को कई बार छुआ पर ना तो मेरे मन में और ना ही राखी के मन में कोई दूसरा ख़याल था। यानि सब कुछ सामान्य था।आभा टांड पर चढ़ी हुई थी और मैं नीचे से सामान पकड़ा रहा था।
अचानकआभा i एकदम से चिल्लाई।
मैंने पूछा- क्या हुआ?
तो राखीi बोली कॉकरोच है। राखी  कॉकरोच से बहुत डरती थी।
मैंने ऊपर चढ़ कर देखा तो कॉकरोच ही था। मैंने कॉकरोच को मार कर नीचे फेंक दिया।राखी अब भी बहुत डरी हुई थी। डर के मारे राखी की आवाज भी नहीं निकल रही थी। जैसे ही मैंने कॉकरोच को मार कर नीचे फेंका राखी i एकदम मुझ से चिपक गई।राखी  डर के मारे कांप रही थी।
मैंने राखी के कंधे पर हाथ रखा और बोला-  राखी अब कॉकरोच नहीं है, मैंने उसे मार कर फ़ेंक दिया है।
पर राखी अब भी मुझ से चिपकी हुई कांप रही थी। मेरा हाथ  राखी की पीठ पर चला गया था। पर अब तक मेरे दिल में कोई भी ऐसी वैसी बात नहीं थी। अचानक मेरी नजर राखी की चूचियों पर गई जो दिल की धड़कन के साथ ऊपर नीचे हो रही थी और अब मुझे अपने सीने में गड़ी हुई महसूस हो रही थी। मेरा लंड एक दम से पजामे में हरकत करने लगा था। पर मैं अपने आप पर कण्ट्रोल करने के पूरी कोशिश कर रहा था।
राखी अब भी मुझसे चिपकी हुई थी। मैंने राखी के चेहरे को आपने हाथ से ऊपर उठाया।   राखी की आँखें बंद थी। राखी कितनी खूबसूरत थी इस बात का एहसास मुझे इसी पल हुआ था। मैंने कभी राखी को इस नजर से देखा ही नहीं था। एक दम गोरा चिट्टा रंग, गुलाबी होंठ। इस पल तो मुझे बस यही नजर आ रहे थे। या फिर आपने सीने में गड़ती राखी की मस्त बड़ी बड़ी चूचियाँ।राखी की चूचियाँ बड़ी बड़ी थी। पर मुझे उसके नंबर का कोई अंदाजा नहीं था।
अब मुझे राखी पर बहुत प्यार आ रहा था। राखी  के बदन के खुशबू और गर्मी ने मुझे दीवाना बना दिया था। अब मेरा आपने ऊपर कण्ट्रोल खत्म होता जा रहा था। राखी का चेहरा मेरे करीब आता जा रहा था। ना जाने कब मेरे होंठ राखी  के होंठों से टकरा गए और मैं राखी के रसीले होंठ अपने होंठो में दबा कर चूसने लगा।  राखी भी मेरा साथ देने लगी। एक दो मिनट तक ऐसे ही रहा। फिर राखीजैसे अचानक नींद से जागी और उसने मुझे अपने से अलग कर दिया। राखी

भाभी और देवर की चुदाई गाथा

भाभी और देवर की चुदाई गाथा

घर में बस हम दो भाई थे। दिनेश मुझसे दस साल बड़ा था। वो एक फ़ेक्टरी में काम करता था। भाभी रीता भी मुझसे सात साल बड़ी थी। मम्मी पापा नौकरी करते थे। घर का सारा काम भाभी पर आ गया था। मुझे यह देख कर बहुत बुरा लगता था कि वो सुबह से काम पर लग जाती थी और दोपहर को ही फ़्री हो पाती थी। धीरे-धीरे मैंने भाभी के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। अब भाभी मुझसे बहुत खुश रहती थी। मैं उनके साथ प्याज, सब्जी आदि काट देता था। वाशिंग मशीन में कपड़े धो देता था, झाड़ू भी लगा देता था।
भाभी का काम करके मैं कॉलेज चला जाता था। मैं जवान हो चला था, कुछ सेक्स की बातों को मैं समझने भी लगा था। घर में मात्र भाभी ही थी जिसके शरीर के उभारों को देख कर मैं खुश रहता था। वो घर में अधिकतर पेटीकोट और एक तंग सा ब्लाऊज पहने रहती थी, जिसमें भाभी के सीने के उभार मुझे बहुत उत्तेजक लगते थे। भाभी भी काम करते करते थक जाती थी, फिर वो आराम करती थी। आज तो वो मेरे कमरे में आ गई थी और मुझसे कहने लगी- निर्मल, मेरी पीठ दबा दे, बहुत दर्द कर रही है। बहुत काम पड़ा है !
जल्दी क्या है भाभी? खाना तो दो बजे खाते हैं, थोड़ा आराम भी कर लिया करो !
अरे ये काम निपटे तो चैन आये ना ... चल दबा दे !
वो बिस्तर पर उल्टी लेट गई और अपनी आंखें बन्द कर ली। मैं धीरे धीरे कमर दबाने लगा। उसे बहुत आराम मिल रहा था। मैं भाभी के पैर भी दबाने लगा था। उसे जाने कब नींद लग गई और वो सो गई। मुझे उसके खर्राटे की आवाज आने लगी। तभी मेरे मन का शैतान जाग उठा। मुझे लगा कि मैं उसकी नींद का फ़ायदा उठा सकता हूँ। बड़ी सतर्कता से मैंने भाभी का पेटीकोट उठाया और अन्दर झांक कर देखा। भाभी के दोनों मस्त चूतड़ बड़े ही उत्तेजक लग रहे थे। भाभी के चूतड़ थोड़े भारी भी थे। मैंने एक बार भाभी को देखा और पेटीकोट के अन्दर हाथ घुसा दिया। बहुत ही धीरे से मैंने भाभी के पृष्ट उभारों को हाथ से छू कर जायजा लिया। मेरा मन हुआ कि उसे काट खाऊं। फिर सावधानी से मैंने पेटीकोट को नीचे कर दिया। मेरा लण्ड खड़ा हो गया था।
तभी भाभी ने करवट ली और सीधी हो गई। मैं जल्दी से दूर हो गया, पर वो अभी भी सो ही रही थी। मुझे फिर एक मौका और मिला और मैंने एक बार से भाभी का पेटीकोट ऊपर करके उसकी चूत के दर्शन कर लिये। छोटे छोटे बाल थे और दोनों लब उभरे हुये थे। मैंने सावधानी से भाभी की ओर देखा और झुक कर उसकी चूत को चूम लिया। चूत सूखी थी ... एक नारी शरीर की खुशबू सी आई। अभी तक तो सभी कुछ सही चल रहा था। मैंने भाभी के ब्लाऊज के बटन भी खोल दिये ... उनके दोनों स्तन पर्वत से उठे हुये मेरे सामने आ गये थे। भाभी के जाग जाने का खतरा था सो मैंने अब बस करना ही उचित समझा। पर अब ब्लाऊज के बटन कैसे लगाऊं, ब्लाऊज तो तंग था। ब्लाऊज के बटन बंद करने से तो वो जाग जाती। मैंने कमरे से निकल जाना ही बेहतर समझा।
मैं नहाने के लिये स्नानघर में घुस गया। मेरे खड़े लण्ड को मैंने मुठ मारा और अपना वीर्य निकाल दिया। नहा धो कर मैं बाहर आ गया। तब तब भाभी जाग गई थी और आश्चर्य से अपना खुला हुआ ब्लाऊज देख रही थी। उसने मुझे देखा तो झेंप गई और हुक बंद करने लगी। समय देखा तो दस बज चुके थे। मैं फिर कॉलेज चला गया था।
दूसरे दिन भी भाभी ने मुझे फिर से पीठ दबाने को कहा और उल्टी लेट गई। आज मैं भाभी की पीठ दबा कम रहा था बल्कि उसे सहला रहा था। बीच बीच में उसके चूतड़ों को भी छू लेता था। मैंने देखा कि भाभी आज भी सो गई थी। मेरा लण्ड फिर से खड़ा होने लगा था। मैंने हौले से भाभी के चूतड़ों को ऊपर से ही सहलाया। फिर उसके स्तनों को सहलाने लगा। अचानक भाभी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
यह क्या कर हो तुम... क्या कल भी तुमने मेरे साथ ऐसे किया था? भाभी ने मुझे एक थप्पड़ मार दिया।
मेरी सारी आशिकी धरी रह गई। मैं बुरी तरह से घबरा उठा था।
भाभी, सॉरी... माफ़ कर देना ... मैं बहक गया था...
भूल गये कि मैं तुम्हारी भाभी हूँ ...
मेरी निगाहें शरम से झुक गई। मैं धीरे से उठा और कमरे से निकल गया। मेरा मन ग्लानि से भर गया था। मैं उस घड़ी को कोस रहा था जब मैंने यह हरकत की थी। दो तीन दिन तक तो मेरी हिम्मत ही नहीं हुई रीता भाभी से आंख मिलाने की। फिर एक दिन मैंने धीरे से किचन में बर्तन धोते हुये भाभी से माफ़ी मांग ली।
भाभी ने मुझे मुस्करा कर कहा- किस बात की माफ़ी ... तुम उस दिन से नाराज हो गये थे, तो मुझे ही अच्छा नहीं लग रहा था, सच बताऊँ तो माफ़ी मुझे मांगनी चाहिये थी !
मेरा मन हल्का हो गया, और भाभी ने भी मुझे गालों पर चूम लिया था। काम समाप्त होते होते साढ़े नौ बज गये थे। भाभी मेरे कमरे में आई और धम्म से बिस्तर पर उल्टी लेट गई।
चल दबा दे मेरी पीठ ... शरमा मत ...
मैंने चुपचाप उसकी पीठ मसल दी। उसे थोड़ा अजीब सा लगा। वो उठ कर बैठ गई- अच्छा चल तू लेट जा, मैं तेरे पैर दबा देती हूँ...
अरे नहीं भाभी, बस ठीक है...
अरे चल ना ... लेट जा ...
भाभी के फिर से वही अपनापन देख कर मैं खुश हो गया। मैं बिस्तर पर सीधा लेट गया। भाभी मेरे पजामे के ऊपर से ही मेरे दोनों पांव दबाने लगी। धीरे-धीरे वो मेरी जांघो तक आ गई। मेरे शरीर में विचित्र सी गुदगुदी होने लगी।
मेरा लण्ड जाने कब खड़ा हो गया और पजामे में से उभर कर बाहर अपनी छवि दिखाने लगा। भाभी बड़े चाव से मेरे खड़े लण्ड को निहार रही थी। उसकी आंखों में गुलाबी डोरे तैरने लगे थे। उसके चेहरे पर वासना का भूत नजर आने लगा था। मेरी जांघे सहलाने और दबाने से मेरे शरीर में सिरहन सी होने लगी थी। लण्ड कड़क होने लगा था। बिना चड्डी के लण्ड पजामे के भीतर लहराने लगा था।
भाभी के हाथ की मुठ्ठियाँ बार बार लण्ड के पास भिंचने लगी थी, मानो वो लण्ड को पकड़ कर मसल देना चाहती हों।
भाभी के हाथ मेरी जांघों के ऊपर तक और लण्ड पास तक जोर जोर से दबा रहे थे।
नशे में मेरी आँखें बंद सी होने लगी थी। लण्ड में बहुत मिठास सी भरती जा रही थी। तभी शायद भाभी का मन बहक उठा और अपनी सारी मर्यादायें तोड़ कर उन्होंने मेरा लण्ड पकड़ लिया और जोर जोर से दबाने लगी।
मैं तड़प उठा... पर उसका हाथ मजबूती से लण्ड पर जमा था। मैंने उत्तेजना से भर कर करवट लेनी चाही पर उसने मेरा लण्ड नही छोड़ा। भाभी के मुख से सिसकारियाँ निकल रही थी। उसका दूसरा हाथ अपनी चूत को मल रहा था। भाभी मुठ भर कर ऊपर नीचे हाथ चला कर मेरे लण्ड को मसलने लगी।
भाभी, हाय रे ... बस करो ... आह्ह्ह्ह ! तभी लण्ड से मेरा वीर्य निकल पड़ा। मेरा पजामा ऊपर तक भीग गया और ढेर सारे माल ने मेरा लण्ड और नीचे की गोलियां तक गीली कर दी। मैंने उठ कर भाभी के स्तन दबा दिये, पर भाभी अपने आप को छुड़ा कर भाग गई। मुझे कुछ समझ में नहीं आया ... । मैं जल्दी से स्नानघर में जाकर नहा कर आ गया।
मैं भाभी के कमरे में गया तो उसने अपने आपको बाथरूम में बंद कर लिया।
तुम जाओ यहां से ...
पर बात तो सुनो ... !
नहीं... बस जाओ, मुझे बहुत लाज आ रही है !
मैं कॉलेज चला गया। मेरा मन भटक गया था। क्लास में भी मन नही लगा।
लंच पर डेढ़-दो बजे :
मम्मी स्कूल से आ चुकी थी, पापा भी आ गये थे। भाभी की बड़ी-बड़ी आंखे नीची झुकी हुई, सभी को भोजन परोस रही थी। भोजन के बाद भाभी के कमरे में गया तो मुझे देख कर उसने अपना चेहरा छुपा लिया।
कोई देख लेगा, तुम जाओ ना ...
मुझे इस शर्म का मतलब समझ में नहीं आया। दूसरे दिन मैं भाभी के साथ काम करता रहा पर वो अपना मुख मुझसे छिपाती रही। मैं बेचैन हो उठा। काम समाप्त होने पर मैंने भाभी को उसके कमरे में घेर ही लिया।
भाभी, प्लीज मुझसे बात करो ना !!
भैया, सॉरी ... गलती हो गई कल ...
कैसी बाते करती हो ... भाभी सच बताऊँ तो आप बहुत अच्छी हैं !
नीरू, पर मैंने तुम्हे तो मारा भी था ना ? !!
चलो बात बराबर हो गई, पहले मैंने गलती की थी, कल आपने फ़ाऊल किया था, बस ?
हम दोनों ने अब शर्म छोड़ सी दी थी। वो मुझसे रोज अपनी पीठ दबवाती, शायद मजे लेने के लिये ! मैं भी उसे सहला सहला कर मस्त कर देता था। फिर वो भी मेरी पीठ दबा देती थी, मेरी टांगें, जांघें मस्त हो कर दबाती थी, फिर मेरे लण्ड के कड़कपन को जी कड़ा करके जी भर कर निहारती थी।भाभी धीरे से आकर मेरे गले लग गई।यह सिलसिला बहुत दिनों तक चलता रहा। हम दोनों इस कार्य में वासना में लोटपोट हो जाते थे। हाँ, एक दो बार मैंने भाभी के मम्मे भी दबा दिये थे, उसे बहुत ही मजा आया था। वो भी जोश में आकर मेरा लण्ड दो तीन बार दबा चुकी थी। एक बार यह दूरी भी मिट गई।
एक दिन मालिश के दौरान भाभी ने कहा- नीरू, एक बात कहूँ?
मैंने प्रश्नवाचक निगाहों से उसे देखा। उसकी नजरें झुक गई।
आज अपना पजामा उतार दो ... मुझे देखना है ! कहते कहते भाभी हिचकिचा सी गई।
तो मैं अपनी आंखे बंद कर लेता हूँ, मेरा पजामा नीचे खींच लो !
नहीं, आंखे बंद नहीं करो... पर मुझे मत देखना !
भाभी ने धीरे से मेरा पजामा खींच कर नीचे खिसका दिया। मैं उसके सुन्दर से चेहरे को एकटक देखता रहा। उसके चेहरे पर आते जाते भाव देखने लगा। उसकी आंखें नशीली हो उठी थी। लाल डोरे उभर आये थे।
मत देखो ना, शरम आती है !
कब तक शरमाओगी भाभी ... जी खोल कर करो जो करना है।
वो बिस्तर के नीचे मेरे पास आ गई और मेरी आंखों पर अपना हाथ रख दिया। मेरे लण्ड की लाल टोपी को उसने उघाड़ लिया और उस पर झुक गई। मेरा लण्ड उसने मुख में भर लिया। मेरे मुख से एक सिसकी निकल पड़ी। भाभी ने मुझे मुड़ कर देखा- भैया, कैसा लगा ... और करूँ क्या ?
भाभी पूरा अन्दर तक घुसेड़ ले, बहुत मजा आ रहा है ! मैने भाभी के चूतड़ों को पकड़ कर अपनी ओर खींचा। उसका जिस्म मेरे और करीब आ गया। वो मेरे ऊपर चढ़ गई ... उसने अपना पेटीकोट ऊपर खींच लिया और अपनी नंगी चूत मेरे मुख पर जमा दी। उसकी गीली चूत से मेरा मुख भी गीला हो गया था। एक तेज वीर्य युक्त सुगंध मुझे आई। यह जवानी से लदी स्त्री के यौनस्त्राव की सुगन्ध थी।
मेरी जीभ लपलपा उठी। उसकी प्यारी सी खुली हुई चूत को मैं चाटने लगा, भाभी सिसकने लगी। भाभी अपने हाथ से अपने पेटीकोट को मेरे चेहरे पर डाल कर अपना नंगापन छुपाने लगी। तभी उसका कड़ा दाना मेरी जीभ से टकरा गया और उसके मुख से जोर से आह निकल गई। वो अपने पांव समेट कर ऊंची हो गई। उसकी प्यारी सी रसीली चूत मुझे अब साफ़ दिख रही थी। उसका बड़ा सा दाना साफ़ चूत के ऊपर नजर आ रहा था। उसकी गाण्ड के बीच उसका मुस्कराता हुया छोटा सा भूरा सा छेद अन्दर बाहर सिकुड़ता हुआ नजर आ रहा था।
मैंने अपनी अंगुली थूक से गीली करके उसके छेद में दबा दी और उसमें गुदगुदी करता हुआ उसके आस पास अंगुली घुमाने लगा। उसने अपनी गाण्ड का छेद ढीला कर दिया और मैंने हौले से अपनी एक अंगुली छेद में घुसा दी। साथ ही में मैंने उसकी चूत फिर से अपने मुख से चिपका ली।
उसने भी यही किया, लण्ड चूसते चूसते मेरी गाण्ड में अंगुली घुसा कर घुमाने लगी। हम दोनों उत्तेजना के सागर मे गोते लगा रहे थे। काफ़ी देर तक यह खेल खेलने के पश्चात भाभी उठ गई। उसकी आंखें वासना से गुलाबी हो गई थी। मेरी नाक में, मुख मण्डल पर उसकी चूत की चिकनाई फ़ैली हुई थी। वो घूम कर मेरी ओर हो गई और मेरे लण्ड पर बैठ गई।
भाभी, कैसा मजा आ रहा है...?
भाभी ने मेरे होठों पर अपनी अंगुली रख दी। फिर एक हाथ से मेरा लण्ड पकड़ा और उसे हिलाया। तन्नाया हुआ लण्ड एक मस्त डाली की तरह झूल गया। फिर उसने लण्ड का लाल टोपा अपनी चूत की दरार पर रख दिया। और अपनी चूचियों को मेरी नजरों के आगे झुला दिया। वो मुझ पर झुकी जा रही थी। मैंने अनायास ही उसके दोनों स्तन हाथों में थाम लिये और उसके कड़े चुचूक मसल डाले। मेरा लण्ड उसकी चूत मे फ़िसलता हुआ अन्दर समाने लगा। एक तेज मीठी सी गुदगुदी लण्ड में उठने लगी। मेरे शरीर का रोम रोम पिघलने लगा।
मेरी मांऽऽऽऽ ! आह री ... मर गई मैं तो... !!!
भाभीऽऽऽऽ ... उफ़्फ़्फ़ ! जोर से घुसेड़ो ... ! मेरे मुख से बरबस निकल पड़ा।
पूरा लण्ड घुसेड़ने के बाद वो मुझ पर अपना भार डाल कर लेट गई और धीरे-धीरे चूत घिसने लगी। मैं असीम आनन्द में खो चला !!! भाभी भी मदमस्त हो कर आंखें बन्द किये अपनी चूत ऊपर नीचे घिसने लगी थी। मेरी कमर भी अपने आप ही ताल मिलाने लग गई थी। वो कभी ऊपर उठ कर अपने स्तन को देखती और मुझे उसे और जोर से दबाने को कहती और फिर मस्ती में चीख सी उठती थी।
अब उसकी रफ़्तार बढ़ने लगी थी। उसके केश मेरे चेहरे पर गिरे जा रहे थे। उसके पतले अधर पत्तियों जैसे कांप रहे थे। उसका यह वासनामय रूप किसी काम की देवी की तरह लग रहा था। तभी उसके मुख से एक चीख सी निकली और वो झड़ने लगी- हाय मेरे नीरू, मैं तो गई... मेरा तो निकला...
उसकी चूत में लहरें चलने लगी। तभी मुझे भी लगा कि मेरा माल निकलने को है, मैंने उसे नीचे की ओर खींच कर दबा लिया। वो कराह उठी और मेरा रस उसकी चूत में भरने लगा। हम दोनों कुछ देर तक झड़ने के बाद भी यूँ ही पड़े रहे, फिर भाभी मेरे ऊपर से हट गई। उसका पेटीकोट कमर से नीचे परदे की भांति नीचे गिर कर उसे ढक लिया। उसने जल्दी से बटन लगा लिये।
चलो पजामा ऊपर खींच लो...
भाभी बहुत मजा आया ... एक बार और करें ...?
ओय होये ... अब लगा ना चस्का, आज तेरे भैया की नाईट ड्यूटी भी है, रात को देखेंगे ! भाभी ने दूसरे दौर की सहमति दे दी, पर रात को।
मैं तैयार हो कर कॉलेज चला गया। सारे दिन गुमसुम सा रहा, चुदाई की मीठी-मीठी यादें पीछा नहीं छोड़ रही थी। बड़ी मुश्किल से शाम आई तो रात आने का नाम ही नहीं ले रही थी।
घर के सभी लोग सो चुके थे। भाभी ने अपना कमरा अन्दर से बन्द करके अपनी चौक की खिड़की खोली और बाहर कूद आई ताकि लगे कि कमरा तो अन्दर से बंद है।
और मेरे कमरे में आते ही दरवाजा ठीक से बंद कर दिया। लाईट बन्द करके वो मेरे बिस्तर में मेरे साथ लेट गई। भाभी धीरे से फ़ुसफ़ुसाई- नीरू, आज तबला बजा दे...
मेरा लण्ड तो पहले ही बेताब हो रहा था, लग रहा था कि नई नई शादी हुई हो जैसे !!!
तबला क्या ... ? बोलो ना... !
वो हिचकचाते हुये बोली- श्... श्... वो, मेरा मतलब है गाण्ड बजानी है !
वो कैसे ...
म बोलते बहुत हो ... गाण्ड नहीं मारी है क्या ? वो झुंझला कर बोली।
मैंने चुप्पी साध ली और पेटीकोट ऊपर कर दिया। मैंने भी अपना पजामा उतार लिया और अपना लण्ड उसकी प्यारी सी दरार में घुसा दिया। उसने अपनी गाण्ड में चिकनाई लगा रखी थी। सो देखते ही देखते लण्ड उसके टाईट छेद में घुस पड़ा।
आनन्द भरी सिसकियाँ एक बार फिर से गूंज उठी। उसकी गाण्ड चुदने लगी। मेरे लिये यह सब एक आनन्ददायक घटना थी... अब हम रोज ही अपनी वासना शांत कर लेते थे। भाभी का स्नेह मुझ पर दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। सच पूछो तो मैं भी रीता भाभी के बिना नहीं रह पाता था।
मेरे देवर ने मुझे अपनी कहानी लिखने को कहा तो मैंने उसी को अपनी कलम दे दी।
बीते दिन एक सपने की तरह लगते हैं ! हैं ना ... ? कोई ऐसा प्यारा सा इन्सान मिल जाये जो किसी की सभी बाते गुप्त रखते हुये जिन्दगी को रंगीन बना दे और काश ऐसे दिन कभी खत्म ना हो ...
मैं आसमान में सितारों के साथ विचरण करती रहूँ, देवर जैसा कोई है क्या

Monday, November 30, 2009

Thursday, November 5, 2009

"लौड़ी घोड़ी"


"लौड़ी घोड़ी" मेरी भाभी की उम्र 21 साल की थी, और मैं 18 साल का था। भाभी ने बीए फ़ाईनल की परीक्षा दी थी और मुझे रिजल्ट लेने भाभी के साथ उज्जैन जाना था। उज्जैन में ही कुछ ऐसा हुआ कि मैं और भाभी बहुत ही खुल गए।मैं और मेरी भाभी रतलाम से सवेरे रवाना हो कर उज्जैन आ चुके थे। स्टेशन पर उतरते ही सामने एक होटल में रूम बुक करा लिया। कमरा अच्छा था। डबलबेड टेबल बाथरूम सभी कुछ साफ़सुथरा था। मैंने और भाभी ने
स्नान किया और यूनिवरसिटी रवाना हो गये। वहां से हमने भाभी का रिजल्ट कार्ड लिया। दिन भर उज्जैन के पवित्र स्थलों के दर्शन किये और होटल वापस आ गये। शाम को हमारे पास कोई काम नहीं था।अचानक भाभी बोली चलो पास में पिक्चर हॉल है ...चलते हैं, थोड़ा समय पास हो जायेगा।हम दोनों हॉल में पहुँच गये। कोई अंग्रेजी फ़िल्म थी। पर वह फ़िल्म बहुत सेक्सी निकली। बहुत से सीन चुदाई के थे उसमें ! थोड़ी थोड़ी देर म��
�ं नंगे और चुदाई के सीन आ जाते थे। पर ये सीन ऐसे थे कि अंधेरे में फ़िल्माये गये थे, पर ये सीन इस तरह फ़िल्माये गये थे कि लण्ड और चूत के अलावा सब दिख रहा था।जब सीन आते तो भाभी मुझे तिरछी नजर से देखने लगती। भाभी की कम उम्र थी, और उस पर इन दृष्यों का सीधा असर हो रहा था और उसकी जवानी का उबाल बेलगाम था। थोड़ी थोड़ी देर में वो मुझे छूने लगी फिर मुझ पर उसका असर देखती। मैं भी कम उम्र का ही था...भाभी गरम ��
�ोती जा रही थी। भाभी ने जब मेरी तरफ़ से कोई ऑब्जेक्शन नहीं पाया तो तो वो आगे बढ़ी और मेरे हाथ पर अपना हाथ धीरे से रख दिया। मैंने भाभी की तरफ़ देखा तो उसकी बड़ी बड़ी गोल आंखे मुझे ही देख रही थी। हम दोनों की नजरें मिली और हम आंखों ही आंखों में देखते हुए एक दूसरे में खोने लगे। उसका हाथ मेरे हाथ को दबाने लगा। मैं एक बार तो सिहर उठा। मैंने भी अब उत्तर में उसका हाथ दबा लिया।मेरा लण्ड भी अब उठने लग��
� था, पर भाभी बहुत ही गरम हो चुकी थी। उसने मेरी जांघ पर हाथ रख दिया और लण्ड की तरफ़ बढ़ने लगी और अपनी आंख से इशारा किया.....मेरा दिल धड़क उठा। उसने अचानक ही मेरे लण्ड पर हाथ रख दिया और अंगुलियों से उसे दबा दिया। "हाय रे !" मेरे मुख से सिसकारी निकल पड़ी।"क्या हुआ?" उसने और जोर से दबाते हुएकहा।सेक्सी सीन परदे पर आ जा रहे थे।"मजा आया ना !" भाभी ने फ़ुसफ़ुसाते हुए पूछा।मैंने भी हाथ उसकी पीठ पर से सरकाते
हुए उसके बोबे थाम लिये और हौले हौले से सहलाने लगा। उसके भरे हुए मांसल बोबे और निपल उत्तेजना से कड़े हो कर तन गये थे।"तुम्हें भी मजा आया भाभी?""हां रे...बहुत मजा आ रहा है।" फिर मेरी ओर देख कर बोली "अभी और मजा आयेगा, देख !" उसने मेरे लण्ड को जोर से दबादिया।"भाभी, हाय रे... !""खूब मजा आ रहा है ना ऐसे, तेरा लण्ड तो मस्त है रे !" एकाएक भाभी ने देसी भाषा का प्रयोग किया और उनका स्वर सेक्सी हो उठा।"भाभी, चलो
होटल चलते हैं, यहाँ कुछ ठीक नहीं है।" मैं अब भड़क उठा था। "नहीं विजय, अभी बोबे और मसलो ना... !" उसकी फ़ुसफ़ुसाहट से लगा कि उसे बहुत ही मजा आ रहा था। पर मैं खड़ा हो गया, मुझे देख कर वो भी खड़ी हो गई। हम बाहर निकल आये और होटल आ गये। रास्ते भर भाभी कुछ नहीं बोली। हम कमरे में आ गये और कपड़े बदल कर मैंने पजामा और बनियान पहन ली और भाभी भी मात्र पेटीकोट और ब्लाऊज पहन कर आ गई। मेरी एक दम से कुछ करने की हिम्मत
नहीं हुई। पर भाभी तो वासना में झुलस रही थी। चुदने के इरादे से बोली,"विजय तुम्हे लौड़ी घोड़ी खेलना आता है?" उसने पूछा।"नहीं तो, तुम्हें आता है?"'अरे हां, बहुत मजा आता है, खेलोगे?""कैसे खेलते है, कुछबताओ !"" देखो मैं तुम्हारी आंखो पर रुमाल बांध देती हूँ, फिर मैं जो कहूं तुम्हें मेरा वो अंग छूना है, अगर कोई दूसरा अंग छू लिया तो आऊट और सजा में तुम्हें घोड़ी बनाना होगा और तुम्हारी गाण्ड में अंगुली ��
�ालूंगी। अगर सही छुआ तो तुम्हारा लण्ड चूत में डालूंगी...तुम भी यही करना।"मुझे सनसनी आने लगी। ये तो बढ़िया खेल है। मुझे तो दोनों तरफ़ से फ़ायदा है, वो हारी तो भी घोड़ी बनेगी और जीती तो चुदेगी। हां पर हारने पर मुझे घोड़ी बनना पड़ेगी। पर खेल मजेदार लगा, था चुदाई का सेक्सी खेल।भाभी तो हर हाल में चुदने को तैयार थी। ये तो जवानी का तकाजा था। भाभी बेशरम हो चली थी। उसने अपने कपड़े मेरे सामने ही उतार द�
��ये। भाभी को नंगा देख कर मेरा लण्ड खड़ा हो गया।भाभी ने मेरा खड़ा लण्ड देख लिया। और बोली,"अपना पाजामा तो उतारो...और अपने लण्ड को तो आज़ाद करो, देखो कैसा जोर मार रहाहै।"मैं शरमा गया, पर वो नहीं शरमाई। मैंने कपड़े उतार दिये। मेरा लण्ड बाहर निकल कर फ़ुफ़कारने लगा।मेरा लण्ड सहलाते हुए बोली,"अब बस नीचे वालों का ही काम है..... चलो खेले, देखो खेलते हुए भटक मत जाना, कंट्रोल रखना !"भाभी ने अब मेरी आँखों पर
रूमाल बांध दिया ...और कहा,"मेरे हाथ पकड़ो !"मैं उसे ढूंढने लगा... भाभी तेज थी ... मेरी तरफ़ गाण्ड करके बैठ गई। मैंने हाथ बढ़ाया और एक जगह अंगुलीरखी..."रख दी अंगुली।" मुझे लगा कि यह हाथ नहीं है...मैंने दूसरी जगह अंगुली रखी तो नाखून लगे।"यही है।" और पट्टी खोल दी वो पांव की अंगुली थी। पर भाभी को नंगा देख कर मैं बेहाल होने लगा। "अब बनो घोड़ी" मैं घोड़ी बन गया। भाभी ने अपनी एक अंगुली मेरी गाण्ड में घुसा दी �
��र अन्दर बाहर करने लगी। "मजा आया देवर जी।" भाभी का ये सब करना अच्छा लग रहा था। "भाभी, ठीक है कर लो, मेरा नम्बर भीआयेगा !"'देवर जी, गाण्ड तो बड़ी मस्त है तुम्हारी" भाभी ने मेरी गाण्ड की तारीफ़ की। मेरी गाण्ड को उसने थपथपाया और अपनी पूरी अंगुली घुसेड़ कर धीरे धीरे बाहर निकाल ली। अब मेरा नम्बर था।मैंने भाभी की आंख में रूमाल बांध दिया और कहा,"मेरी छाती पर हाथ रखो !"उसने बिना कुछ सोचे समझे जो सामन��
� आया, पकड़ लिया। देखा तो मेरे पेट पर हाथ था।"भाभी, घोड़ी बनो।" भाभी के तन की आग बढ़ती जारही थी। वो तुरंत घोड़ी बन गई। मैंने उसकी गाण्ड सहलाई और अपना तना हुआ लण्ड गाण्ड के छेद में लगा कर अन्दर घुसा दिया।"हाय, ये क्या, तुम्हें अंगुली घुसानी है.....लण्ड नहीं।" पर तब तक लण्ड जड़ तक पहुंच चुका था। भाभी ने तुरन्त पलट कर लण्ड निकाल दिया। मेरा गीला लण्ड कड़कता हुआ बाहर आ गया। मैंने अब अपनी अंगुली भाभी क
ी गाण्ड में घुसा दी।"अब धीरे धीरे अन्दर बाहर करो" मैं उसकी गाण्ड मेंअंगुली करता रहा। वह सिसकी भरती रही।"भाभी, प्लीज, यह लौड़ी घोड़ी रहने दो ना, मेरे लण्ड का तो कुछ ख्याल करो !""खेल के जो नियम है उसे तो मानना पड़ेगा ना, चलो अब मेरी बारी है, अपनी आंखे बन्द करो !" मैंने आंखे बन्द कर ली।"मेरी चूंचियां पकड़ो..." इस बार मुझे थोड़ा सा दिख रहा था। मैंने सीधे ही भाभी की चूंचिया दबा दी"नहीं ये तो बेईमानी है..
." वो कहती रही।"नियम तो नियम है" और मैंने उसे धक्का दे कर बिस्तर पर लेटा दिया और उस पर चढ़ गया। उबलता हुआ लण्ड मैंने उसकी चूत पर रख दिया। और अन्दर पेल दिया। भाभी पिघल उठी, उसने भी मदद करते हुये अपनी चूत उछाल दी और दोनों ही सिसकारी भरते हुए एक दूसरे से चिपक गये। लण्ड चूत में घुसता चला गया। भाभी ने अपने होंठ भींच लिये और जैसे उसे जन्नत मिल गई हो।"देवर जी, इस खेल में चुदाई से पहले जितना तड़पोग
े उतना ही मजा चुदाई में आता है,इसीलिये लौड़ी घोड़ी खेल खेलते है, और चुदाई के लिये तड़पते रहते रहते हैं।""हां भाभी, मेरा तो खेल खेल में माल ही निकलने वाला था।""तेरे भैया का तो कितनी ही बार निकल जाता था।"उसकी वासना तेजी पर थी। वो जोर जोर से उछल कर लण्ड ले रही थी। मैं उसकी नरम चूत को जम के धक्के मार रहा था। जवान चूत थी, पानी भी बहुत छोड़ रही थी, जड़ तक लौड़ा ले रही थी। उसकी मांसल चूंचिया छोटी मगर बे��
�द कड़ी थी। मसलने में बड़ा आनन्द आ रहा था। कुछ ही देर में मेरा वीर्य निकल पड़ा। उसकी चूत भी अन्दर से लहरा रही थी, वो भी झड़ चुकी थी।हम दोनों ने कुछ देर आराम किया फिर भाभी ने कहा,"देवर जी, हां तो आगे चले।""चलो खेलते हैं !" मैंने भी झट हां कर दी।"यह दूसरा दौर है। पहले खेल में तुम जीते थे, अब मैं तो घोड़ी बनी रहूंगी... तुम मेरे शरीर के किसी भी अंग को चाट सकते हो, अपनी लौड़ी को, यानी लण्ड को किसी भी छेद में
घुसा कर मजा ले सकते हो, चलो आंखे बद करो !"भाभी ने मेरी आंखें फिर रूमाल से बंद कर दी। अब वो बिस्तर पर झुक कर फिर से घोड़ी बन गई। मैंने जैसे ही अपना मुँह आगे बढ़ाया तो गाण्ड का स्पर्श हुआ। मैंने अपनी जीभ निकाली और जीभ उसके चूतड़ों पर फ़ेरने लगा। भाभी ने निशाना बांधा और गाण्ड का छेद सामने कर दिया। मेरी जीभ ने छेद पह्चान लिया और चाटने लगा और उसके छेद में भी जीभ डालने लगा।जैसे ही जीभ बाहर निकाल�
�� मुझे बालों का स्पर्श लगा, मेरी जीभ अब उसकी चूत चाट रही थी।मेरा लण्ड तन्ना रहा था। किसी भी छेद में घुस कर एक बार और अपना वीर्य निकालना चाह रहा था। मैंने अब रूमाल हटा लिया और उसे निहारा। उसके गोल गोल गोरे गोरे चूतड़ सामने उभरे हुए थे। भाभी मस्ती में अपनी आंखें बंद किये हुए थी। मैंने जल्दी से अपना लण्ड उसकी गाण्ड में घुसेड़ दिया। भाभी बोलउठी,"देवर जी, लौड़ी घोड़ी... हाय रे...लौड़ी घोड़ी...गाण्ड
चोद दो...हाय !"भाभी ने मस्ती में गाण्ड ढीली छोड़ दी...और लण्ड गाण्ड की गहराइयों में उतरता चला गया। मुझे तेज मीठी मीठी सी लण्ड में मस्ती लगी। टाईट गाण्ड थी। पर उसे दर्द हो रहा था, फिर भी मजा ले रही थी। कुछ ही देर में उसने कराहते हुए कह ही दिया," देवर जी, चूत की मस्ती दो ना...मेरा जी तो चूत चुदाने कर रहा है...देखो पानी भी छोड़ रही है !"मैंने उसकी बात समझी कि ये तो सिर्फ़ मर्दो का सुख है...औरत का सुख तो च
ूत में है। मैंने लण्ड निकाला और ... लौड़ी घोड़ी ... कहा और चूत में लण्ड घुसा डाला। अब उसे असली मजा आया। और घोड़ी बने बने ही चूत चुदवाने लगी। इस पोजिशन में लण्ड पूरा अन्दर जा रहा था। मेरे पेड़ू तक चूत से चिपक कर चोद रहा था।चुदाई तेज हो उठी। भाभी अपने मुँह से सिसकारियोँ के साथ मां बहन, भोसड़ी, कुत्ते जैसे गालियाँनिकालने लगी। मुझे लगा कि अब वो चरमसीमा पर आकर झड़ने वाली है। और मेरा अनुमान सही निक��
�ा... हम दोनों ही एक साथ झड़ने लगे। चूत में दोनों माल भरने लगा और माल आपस में एक हो गया। मैंने उसकी चूत से गिरते हुए माल को हाथ में लिया और चखा...फ़ीका फ़ीका सा, लसलसा सा, मुझे मजा नहीं आया। पर भाभी ने देखा तो मेरा हाथ पूरा चाट गई और चूत से माल हाथ में ले लेकर चाटने लगी।"खबरदार, जो मेरे माल को हाथलगाया ... लौड़ी घोड़ी में सारा माल मेरा होता है।अब तीसरा दौर... आप घोड़ी बनेगे और मैं आपकी लौड़ी यानी लण्ड न
ीचे से चूस चूस कर तुम्हारा शहद निकालूंगी, तुम घोड़ी की पोजिशन में चाहे मेरी चूत चाटो या कुछ भी करो।" पर दो चुदाई करने के बाद मैं थक गया था। मैंने जैसे कुछ सुना ही नहीं और पलंग पर लेट गया। वो मुझे झकझोरती रही पर मेरी आंखे नींद में डूबती चली गई। सवेरे जब उठे तो भाभी मेरे से चिपकी हुई नंगी ही सो रही थी।मुझे भाभी ने लौड़ी घोड़ी का खेल अच्छी तरह से सिखा दिया। कोई भी, चाहे लड़का हो या लड़की यह खेल �
��्री में खेल सकता है। मजे की गारण्टी है।

गैर मर्द की बाँहों


दोस्तो ! मुझे गैर मर्दों की बाँहों में सुख मिलता है, यह मैं पहले भी बता चुकी हूँ!

पति के पास कनाडा आकर भी मुझे वो सुख नहीं मिल पाया और मुझे यहाँ पर भी गैर मर्द की बाँहों में जाना पड़ा।

मैं यहाँ तो आ गई और पति के पास रहने लगी लेकिन यहाँ मुझे भी काम करना पड़ता था मेरे आने की वजह से पति अपने दोस्तों से अलग रहने लगे। मैंने तो कहा था कुछ दिन उनके साथ रुकते हैं। लेकिन फ़ोन का बिल, गैस का बिल, पानी का बिल, हर महीने घर की किश्त जाती।

मुझे जिस पब में काम मिला था, वहां मेरी दोस्ती पीटर से हुई। जल्दी ही यह दोस्ती शारीरिक सबंधों में तबदील हो गई। उसके बाद पीटर ने मुझे खूब चोदा, अपने दोस्त के साथ मिलकर मेरा बाजा बजाया, उसके बाद दोंनो ने मुझे चार हज़ार अमरीकी डॉलर भी दिए। उसके बाद हम नीचे पब में वापिस आ गए और मैं उनको ड्रिंक सर्व करती रही।

जाते हुए अपना मोबाइल नंबर दिया और टिप की तौर पे ५०० अमरीकी डॉलर दिए मुझे पैसों की ज़रुरत थी। इंडिया में मैंने बहुत ऐश की थी और अब मेरे सर पर काम करने का बोझ था इसके बिना यहाँ कोई गुजारा नहीं था सो तभी जब मैंने पीटर को कॉल लगाई और बात की उसने मुझे एक व्यस्क मूवी में काम करने की ऑफर दी। उसके दोस्त ने कहा कि एक इंडियन लड़की की मूवी इंडियन मार्केट में धमाल मचा देगी। उसने मुझे कहा कि फिल्म डबल एक्स होगी और उसकी अच्छी कीमत देने को तैयार है लेकिन मैंने बदनामी के डर से सोचने के लिए कहा। फिर सोचा कि वैसे भी तो मैं करवाती हूँ।

मैंने उनके सामने शर्त रखी कि मेरे चेहरे को इस कदर तरीके से मेक-अप किया जाए, मतलब आँखों पे स्टीकर, गालों पे स्टीकर !

वो मान गया।

मैंने ७०,००० डॉलर लेने को बोला।

वो मान गया।

मैंने उसे कहा- यह फिल्म टोरंटो में नहीं, कहीं और बनाओ !

एडबर्ग में फ़िल्म बनाना निश्चित हुआ। नाम था- पेओर इंडियन स्लाट विद इग्लिश मेंस

सी हाउस रेंट लिया गया।

वहां पहुंची। पीटर के साथ मुझे बिकनी दी गई और मेरा पहला सीन था सनबाथ !

मैं वहां अकेली बीच पे लेट गई। मेरे हाथ में मोबाइल था जिसपर मैं लेटी हुई ब्लू क्लिप्स देखते हुए अपने बूब्स मसलने लगती हूँ और फिर पैंटी में हाथ डाल चूत को !

कैमरे के सामने थोड़ा नर्वस थी।

तभी वहाँ तीन आदमी आये, एक नीग्रो था और दो गोरे !

तीनों आकर जब मुझे चूत, मम्मे मसलते देखते हैं और मुझे कहते हैं- बेबी एनी प्रॉब्लम?

मेरी चूत को देखते हुए थोड़ी स्माइल देते हैं, बिना कुछ कहे मैं भी स्माइल पास करती हूँ! ऐसा करते ही तीनों मुझे वहां से गोदी में उठाते हुए सी हाउस में लेकर जाते हैं।

आर यू इंडियन?

येस !

ओके ! नीड हेल्प ?

यम ! मैं फिर से स्माइल देती हूँ, एक गोरा मेरी पैंटी उतार देता है और अपने मुँह को चूत पे रखते हुए चातने लगा मेरे सर पे खड़े दो मर्द ! दोनों ने कुछ नहीं पहना था। उनके लौड़े देख देख कर चूत चटवा रही थी मैं !

नीग्रो का लौड़ा मुँह में ले लिया और गोरे का हाथ में !

वो बोला- हे बिच ! व्हाट्स योउर एज ?

२७ !

ओह वो इंग्लिश में बोल रहे थे। मैं आपको हिंदी में बताती हूँ !

मैं सताइस साल की हूँ !

पहली बार कब चुदी?

नौ साल पहले !

तुझे हमारे लौड़े कैसे लगे?

यम ! बहुत अछे लगे !

बोले- आज तेरे दोनों छेदों को एक साथ चोदेंगे ! पसन्द करोगी ?

हां चोदो मुझे !

और कैमरा मैन ने कंडोम की डिब्बी फेंकी। मैंने उसके लौड़े पे कंडोम चढ़ा दिया और उसने अन्दर डाल दिया।

हाय क्या लौड़ा था !

उसने रफ़्तार पकड़ी। मैंने भी अब एक धन्धे वाली कॉल-गर्ल की तरह अपने आपको बेशर्म कर दिया। लौड़े का तो मुझे पहले से बहुत चस्का था। नीग्रो का लौड़ा देख कर मैं पागल हो गई। इतना बड़ा लौड़ा !

डर भी लगता था !

गोरा रुक गया। नीग्रो ने कंडोम डालते हुए मुझे लौड़े पे बैठने को कहा। इतना बड़ा लौड़ा, लेकिन देखते ही मैंने पूरा अन्दर ले लिया और उसका लौड़ा अन्दर मेरे गर्भाशय से टकराता तो मुझे जन्नत दिखने लगती !

वाह क्या लड़की है !

बिच है !

गोरा पीछे आया और मेरी गांड के छेद को चाट करके ऊँगली डालते हुए जगह सी बनाई।

एक लौड़ा चूत में था। मुझे उसकी चेस्ट की तरफ नीचे दबाते हुए गोरे ने मेरी गांड को खोलते हुए उस पे लौड़ा रख कर धक्का मारा और उसका आधा लौड़ा गांड में समां गया। दर्द से मैं तड़पने लगी। लेकिन देखते ही दोनों के लौड़े में खुद बोल बोल कर डलवाने लगी। इतना मजा एक लौड़ा मेरे मुँह में दो मेरे अन्दर !

उसने कहा- तू अपनी भाषा में गरम बातें कर ! ताकि लोग इसको और खरीदें !

आह चोद मुझे मादरचोद ! फाड़ डालो मेरी चूत ! बना दो भोंसड़ा ! हाय मेरे राजा ! चोदो ! कमीने तू मुंह में डाले रख !

अब उनमें से एक ने अदला बदली कर ली और जिसका चूस रही थी अब उसने डाल लिया और तेजी से चोदने लगे। करीब पन्द्रह मिनट की चुदाई के बाद तीनों ने एक साथ अपने लौड़िं का सारा पानी मेरे चेहरे, होंठ हर जगह उगल दिया और मैं उनके पानी से तर हो गई। रहता हुआ पानी मैंने चाट के साफ़ कर दिया।

वे बोले- एन्जॉय बेबी?

येस !

दोस्तो, अभी तो फिल्म का पहला सीन वहाँ फ़िल्माया गया। उसके बाद अगला सीन मुझे होटल में करना था जिसमें दोनों बन्दे नीग्रो थे और उनके लौड़े कैसे होंगे यह अनुमान लगाओ और बताओ कैसी लगी मेरी चुदाई ?

दोस्तो, हर कोई पूछता है- यह असली है?

हाँ ! यह असली है !

कनाडा में मेरी सर्विस के लिए मुझे इ-मेल कर दो अब मेरे पास एक बी.एम.डबल्यू, एक मरसिडीज़ और एक पोश कार है। मैं एक हाई प्रोफाइल कॉल गर्ल बन चुकी हूँ और एक अडल्ट क्लब अपना है।

लेकिन उस फिल्म के अगले सीन के बारे में ज़रूर लिखूंगी। प्लीज़ मेरी चुदाई के हर किस्से को छाप देना गुरु जी !
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